
उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पिछले दिनों एक विशाल जनसभा को संबोधितकरते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश सरकार ने तो वोट की राजनीति के वशीभूत होकर मुसलमानों को चार प्रतिशतआरक्षण देने का मसला पेश किया था। उसके इरादे पर अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।धर्म अथवा मजहब के आधार पर आरक्षण संविधान की मूल भावनाओं के विरुद्ध है। इस प्रकार के संविधान विरोधीनिर्णयों से न केवल दलित हिंदुओं के हितों पर कुठाराघात होगा, अपितु राष्ट्र की एकता व अखंडता के लिए भी यहएक खतरनाक संकेत है। सांसद योगी ने कहा कि आंध्र प्रदेश की सरकार द्वारा मुसलमानों के लिए गोषित चारप्रतिशत आरक्षण को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (हैदराबाद) की संविधान पीठ ने रोक लगा दी थी, लेकिनउच्चतम न्यायालय द्वारा मजहबी आरक्षण को बहाल करना दिया गया है। उन्होने कहा कि आरक्षण की मूलभावना सामाजिक अस्पृश्यता पर आधाररित है। अस्पृश्यता का कलंक सिर्फ हिंदू धर्म में ही है। फिर भी यह जानतेहुए कि सन् 1947 में इस देश के विभाजन का कारण मजहबी उन्माद रहा है, ऐसा किया गया है। मजहब या धर्म केआधार पर आरक्षण देना उसी मजहबी उन्माद को बढ़ावा देने जैसा है, जिसके कारण देश विभाजित हुआ था। यहभारत और उसकी प्राचीन संस्कृति के खिलाफ एक ऐसा षडयंत्र है, जिसका यदि समय पर विरोध नहीं हुआ तोविश्व की सबसे प्राचीनतम संस्कृति वाला देश भारत अपनी पहचान, और संप्रभुता को खो देगा। सांसद योगी ने कहाकि आश्चर्यजनक है कि सन 1961 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने, सन 1948 में मोरारजीदेसाई ने, सन 1980 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने, सन 1988 में राजीव गांधी ने और सन 2001 में अटल बिहारीवाजपेयी ने मजहबी आरक्षण की मांग को सिरे से नकार दिया था तथा समय-समय पर उच्चतम न्यायालय ने भीकई फैसलों में मजहबी आरक्षण की मांग को खारिज किया है। कांग्रेस नेतृत्व की वर्तमान यूपीए सरकार ने भी सन्में संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इस देश के दलितों और पिछड़ी जाति के नागरिकों को ईसाई औरमुस्लिम संस्थाओं में आरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से वंचित कर दिया था। अब यह मामला नए सिरे जनता कोआंदोलित कर रहा है। इसका जमकर विरोध किया जाएगा।
2005
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